हापुड़ निवासी बहू पिंकी अपनी वृद्ध सास ऊषा देवी को विशेष रूप से तैयार की गई कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से हापुड़ तक पैदल यात्रा कर रही हैं।

हरिद्वार। कांवड़ यात्रा के दौरान इस बार हरिद्वार से एक ऐसा भावुक दृश्य सामने आया है, जिसने हर किसी का दिल छू लिया। उत्तर प्रदेश के हापुड़ निवासी एक परिवार में बहू पिंकी अपनी वृद्ध सास ऊषा देवी को विशेष रूप से तैयार की गई कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से हापुड़ तक पैदल यात्रा कर रही हैं। इस सेवा भाव से भरी यात्रा में उनकी नन्ही बेटी राधा भी अपनी दादी की सेवा में पूरी श्रद्धा के साथ साथ चल रही है।

ऊषा देवी की लंबे समय से हरिद्वार आकर गंगा स्नान करने और कांवड़ यात्रा करने की इच्छा थी, लेकिन बढ़ती उम्र के कारण वह पैदल चलने में असमर्थ थीं। परिवार में चार पुत्र होने के बावजूद उनकी इस इच्छा को पूरा करने का संकल्प बहू पिंकी ने लिया।

पिंकी सबसे पहले अपनी सास को हर की पैड़ी लेकर पहुंचीं, जहां उन्होंने गंगा स्नान कराया। इसके बाद ऊषा देवी को कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार से हापुड़ तक की पैदल यात्रा शुरू की। रास्तेभर वह कंधों पर कांवड़ का भार उठाकर अपनी सास को सुरक्षित मंजिल तक पहुंचाने का प्रयास कर रही हैं।

पिंकी का कहना है कि सास की सेवा करना उनके लिए केवल कर्तव्य नहीं, बल्कि सौभाग्य की बात है। उनका मानना है कि जिस प्रकार माता-पिता अपने बच्चों के लिए जीवनभर त्याग करते हैं, उसी तरह बुढ़ापे में उनकी सेवा करना हर परिवार की जिम्मेदारी है।

इस यात्रा का सबसे प्रेरणादायक पक्ष नन्ही राधा है। कम उम्र होने के बावजूद वह अपनी दादी का हालचाल पूछती रहती है और यात्रा के दौरान हर संभव मदद करती है। लोगों का कहना है कि इतनी छोटी उम्र में ऐसे संस्कार और सेवा भावना दुर्लभ देखने को मिलती है।

हरिद्वार से हापुड़ मार्ग पर जहां-जहां यह परिवार पहुंच रहा है, वहां राहगीर और कांवड़िए रुककर उनके सेवा भाव की सराहना कर रहे हैं। कई लोग उनके साथ तस्वीरें खिंचवा रहे हैं, जबकि अनेक श्रद्धालु बहू पिंकी को आधुनिक श्रवण कुमार कहकर सम्मान दे रहे हैं।

यह अनोखी कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति में सेवा, त्याग, पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों की जीवंत मिसाल बन गई है। बहू पिंकी और नन्ही राधा ने अपने समर्पण से यह संदेश दिया है कि परिवार का सबसे बड़ा धर्म अपने बुजुर्गों का सम्मान और सेवा करना है।

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